जब जवानी गई छुड़ा कर हाथ
उस पे पीरी न कुछ चली दिल की
जोर्ज पेश शोर
जहाँ में ज़र का है कारख़ाना न कोई अपना न है यगाना
तलाश-ए-दौलत में है ज़माना ख़ुदा ही हाफ़िज़ है मुफ़्लिसी का
जोर्ज पेश शोर
नहीं है टूटे की बूटी जहान में पैदा
शिकस्ता जब हुआ तार-ए-नफ़स नहीं चलता
जोर्ज पेश शोर
पैक-ए-ख़याल भी है अजब क्या जहाँ-नुमा
आया नज़र वो पास जो अपने से दूर था
जोर्ज पेश शोर
रुके है आमद-ओ-शुद में नफ़स नहीं चलता
यही है हुक्म-ए-इलाही तो बस नहीं चलता
जोर्ज पेश शोर
शौक़ ने की जो रहबरी दिल की
मंज़िल-ए-इश्क़ तय हुई दिल की
जोर्ज पेश शोर
तुम्हारे इश्क़ में क्या क्या न इख़्तियार किया
कभी फ़लक का कभी ग़ैर का वक़ार किया
जोर्ज पेश शोर

