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वहशत रज़ा अली कलकत्वी शायरी | शाही शायरी

वहशत रज़ा अली कलकत्वी शेर

54 शेर

तू है और ऐश है और अंजुमन-आराई है
मैं हूँ और रंज है और गोशा-ए-तन्हाई है

वहशत रज़ा अली कलकत्वी




रुख़-ए-रौशन से यूँ उट्ठी नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता
कि जैसे हो तुलू-ए-आफ़्ताब आहिस्ता आहिस्ता

वहशत रज़ा अली कलकत्वी




क़द्रदानी की कैफ़ियत मालूम
ऐब क्या है अगर हुनर न हुआ

वहशत रज़ा अली कलकत्वी




निशान-ए-मंज़िल-ए-जानाँ मिले मिले न मिले
मज़े की चीज़ है ये ज़ौक़-ए-जुस्तुजू मेरा

वहशत रज़ा अली कलकत्वी




नहीं मुमकिन लब-ए-आशिक़ से हर्फ़-ए-मुद्दआ निकले
जिसे तुम ने किया ख़ामोश उस से क्या सदा निकले

वहशत रज़ा अली कलकत्वी




न वो पूछते हैं न कहता हूँ मैं
रही जाती है दिल की दिल में हवस

वहशत रज़ा अली कलकत्वी




मिरे तो दिल में वही शौक़ है जो पहले था
कुछ आप ही की तबीअत बदल गई होगी

वहशत रज़ा अली कलकत्वी




मेरा मक़्सद कि वो ख़ुश हों मिरी ख़ामोशी से
उन को अंदेशा कि ये भी कोई फ़रियाद न हो

वहशत रज़ा अली कलकत्वी




मेहनत हो मुसीबत हो सितम हो तो मज़ा है
मिलना तिरा आसाँ है तलबगार बहुत हैं

वहशत रज़ा अली कलकत्वी