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प्रेरक शायरी | शाही शायरी

प्रेरक

112 शेर

हो न मायूस ख़ुदा से 'बिस्मिल'
ये बुरे दिन भी गुज़र जाएँगे

बिस्मिल अज़ीमाबादी




कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीअ'त से उछालो यारो

दुष्यंत कुमार




तू मर्द-ए-मोमिन है अपनी मंज़िल को आसमानों पे देख नादाँ
कि राह-ए-ज़ुल्मत में साथ देगा कोई चराग़-ए-अलील कब तक

एहतिशामुल हक़ सिद्दीक़ी




अभी से पाँव के छाले न देखो
अभी यारो सफ़र की इब्तिदा है

एजाज़ रहमानी




और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

sorrows other than love's longing does this life provide
comforts other than a lover's union too abide

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़




दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़




हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे

We will nourish the pen and tablet; we will tend them ever
We will write what the heart suffers; we will defend them eve

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़