मैं ने माँ का लिबास जब पहना
मुझ को तितली ने अपने रंग दिए
फ़ातिमा हसन
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मैं ने पहुँचाया उसे जीत के हर ख़ाने में
मेरी बाज़ी थी मिरी मात समझता ही नहीं
फ़ातिमा हसन
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मकाँ बनाते हुए छत बहुत ज़रूरी है
बचा के सेहन में लेकिन शजर भी रखना है
फ़ातिमा हसन
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पहचान जिन से थी वो हवाले मिटा दिए
उस ने किताब-ए-ज़ात का सफ़्हा बदल दिया
फ़ातिमा हसन
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पूरी न अधूरी हूँ न कम-तर हूँ न बरतर
इंसान हूँ इंसान के मेआर में देखें
फ़ातिमा हसन
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रात दरीचे तक आ कर रुक जाती है
बंद आँखों में उस का चेहरा रहता है
फ़ातिमा हसन
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सुकून-ए-दिल के लिए इश्क़ तो बहाना था
वगरना थक के कहीं तो ठहर ही जाना था
फ़ातिमा हसन

