उम्र भर मिलने नहीं देती हैं अब तो रंजिशें
वक़्त हम से रूठ जाने की अदा तक ले गया
फ़सीह अकमल
आँखों में न ज़ुल्फ़ों में न रुख़्सार में देखें
मुझ को मिरी दानिश मिरे अफ़्कार में देखें
फ़ातिमा हसन
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अधूरे लफ़्ज़ थे आवाज़ ग़ैर-वाज़ेह थी
दुआ को फिर भी नहीं देर कुछ असर में लगी
फ़ातिमा हसन
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और कोई नहीं है उस के सिवा
सुख दिए दुख दिए उसी ने दिए
फ़ातिमा हसन
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बहुत गहरी है उस की ख़ामुशी भी
मैं अपने क़द को छोटा पा रही हूँ
फ़ातिमा हसन
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भूल गई हूँ किस से मेरा नाता था
और ये नाता कैसे टूटा भूल गई
फ़ातिमा हसन
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बिछड़ रहा था मगर मुड़ के देखता भी रहा
मैं मुस्कुराती रही मैं ने भी कमाल किया
फ़ातिमा हसन
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