हज़ार तर्क-ए-वफ़ा का ख़याल हो लेकिन
जो रू-ब-रू हों तो बढ़ कर गले लगा लेना
फ़ारिग़ बुख़ारी
जलते मौसम में कोई फ़ारिग़ नज़र आता नहीं
डूबता जाता है हर इक पेड़ अपनी छाँव में
फ़ारिग़ बुख़ारी
जितने थे तेरे महके हुए आँचलों के रंग
सब तितलियों ने और धनक ने उड़ा लिए
फ़ारिग़ बुख़ारी
कितने शिकवे गिले हैं पहले ही
राह में फ़ासले हैं पहले ही
फ़ारिग़ बुख़ारी
क्या ज़माना है ये क्या लोग हैं क्या दुनिया है
जैसा चाहे कोई वैसा नहीं रहने देते
फ़ारिग़ बुख़ारी
मंसूर से कम नहीं है वो भी
जो अपनी ज़बाँ से बोलता है
फ़ारिग़ बुख़ारी
मोहब्बतों की शिकस्तों का इक ख़राबा हूँ
ख़ुदारा मुझ को गिराओ कि मैं दोबारा बनूँ
फ़ारिग़ बुख़ारी

