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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

अल्फ़ाज़ न आवाज़ न हमराज़ न दम-साज़
ये कैसे दोराहे पे मैं ख़ामोश खड़ी हूँ

फ़रहत ज़ाहिद




औरत हूँ मगर सूरत-ए-कोहसार खड़ी हूँ
इक सच के तहफ़्फ़ुज़ के लिए सब से लड़ी हूँ

फ़रहत ज़ाहिद




जिस बादल ने सुख बरसाया जिस छाँव में प्रीत मिली
आँखें खोल के देखा तो वो सब मौसम लम्हाती थे

फ़रहत ज़ाहिद




दीवारें खड़ी हुई हैं लेकिन
अंदर से मकान गिर रहा है

फ़ारिग़ बुख़ारी




दो दरिया भी जब आपस में मिलते हैं
दोनों अपनी अपनी प्यास बुझाते हैं

फ़ारिग़ बुख़ारी




हम एक फ़िक्र के पैकर हैं इक ख़याल के फूल
तिरा वजूद नहीं है तो मेरा साया नहीं

फ़ारिग़ बुख़ारी




हम से इंसाँ की ख़जालत नहीं देखी जाती
कम-सवादों का भरम हम ने रवा रक्खा है

फ़ारिग़ बुख़ारी