नई मंज़िल का जुनूँ तोहमत-ए-गुमराही है
पा-शिकस्ता भी तिरी राह में कहलाया हूँ
फ़ारिग़ बुख़ारी
पुकारा जब मुझे तन्हाई ने तो याद आया
कि अपने साथ बहुत मुख़्तसर रहा हूँ मैं
फ़ारिग़ बुख़ारी
सफ़र में कोई किसी के लिए ठहरता नहीं
न मुड़ के देखा कभी साहिलों को दरिया ने
फ़ारिग़ बुख़ारी
तुम्हारे साथ ही उस को भी डूब जाना है
ये जानता है मुसाफ़िर तिरे सफ़ीने का
फ़ारिग़ बुख़ारी
याद आएँगे ज़माने को मिसालों के लिए
जैसे बोसीदा किताबें हों हवालों के लिए
फ़ारिग़ बुख़ारी
यही है दौर-ए-ग़म-ए-आशिक़ी तो क्या होगा
इसी तरह से कटी ज़िंदगी तो क्या होगा
फ़ारिग़ बुख़ारी
ज़िंदगी में ऐसी कुछ तुग़्यानीयाँ आती रहीं
बह गईं हैं उम्र भर की नेकियाँ दरियाओं में
फ़ारिग़ बुख़ारी

