ये क्यूँ कहते हो राह-ए-इश्क़ पर चलना है हम को
कहो कि ज़िंदगी से अब फ़राग़त चाहिए है
फ़रहत नदीम हुमायूँ
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अज़ीज़ मुझ को हैं तूफ़ान साहिलों से सिवा
इसी लिए है ख़फ़ा मेरा नाख़ुदा मुझ से
फ़रहत शहज़ाद
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बात अपनी अना की है वर्ना
यूँ तो दो हाथ पर किनारा है
फ़रहत शहज़ाद
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देख के जिस को दिल दुखता था
वो तस्वीर जला दी हम ने
फ़रहत शहज़ाद
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हम से तंहाई के मारे नहीं देखे जाते
बिन तिरे चाँद सितारे नहीं देखे जाते
फ़रहत शहज़ाद
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हर्फ़ जैसे हो गए सारे मुनाफ़िक़ एक दम
कौन से लफ़्ज़ों में समझाऊँ तुम्हें दिल का पयाम
फ़रहत शहज़ाद
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मैं शायद तेरे दुख में मर गया हूँ
कि अब सीने में कुछ दुखता नहीं है
फ़रहत शहज़ाद
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