मेरे जुनूँ को ज़ुल्फ़ के साए से दूर रख
रस्ते में छाँव पा के मुसाफ़िर ठहर न जाए
फ़ानी बदायुनी
मेरी हवस को ऐश-ए-दो-आलम भी था क़ुबूल
तेरा करम कि तू ने दिया दिल दुखा हुआ
फ़ानी बदायुनी
मुझ तक उस महफ़िल में फिर जाम-ए-शराब आने को है
उम्र-ए-रफ़्ता पलटी आती है शबाब आने को है
फ़ानी बदायुनी
मुझे बुला के यहाँ आप छुप गया कोई
वो मेहमाँ हूँ जिसे मेज़बाँ नहीं मिलता
फ़ानी बदायुनी
मुस्कुराए वो हाल-ए-दिल सुन कर
और गोया जवाब था ही नहीं
फ़ानी बदायुनी
न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम
रहा ये वहम कि हम हैं सो वो भी क्या मालूम
फ़ानी बदायुनी
न इंतिहा की ख़बर है न इंतिहा मालूम
रहा ये वहम कि हम हैं सो ये भी क्या मालूम
फ़ानी बदायुनी

