रूह अरबाब-ए-मोहब्बत की लरज़ जाती है
तू पशेमान न हो अपनी जफ़ा याद न कर
फ़ानी बदायुनी
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रूह घबराई हुई फिरती है मेरी लाश पर
क्या जनाज़े पर मेरे ख़त का जवाब आने को है
फ़ानी बदायुनी
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शिकवा-ए-हिज्र पे सर काट के फ़रमाते हैं
फिर करोगे कभी इस मुँह से शिकायत मेरी
फ़ानी बदायुनी
सुने जाते न थे तुम से मिरे दिन रात के शिकवे
कफ़न सरकाओ मेरी बे-ज़बानी देखते जाओ
फ़ानी बदायुनी
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सुने जाते न थे तुम से मिरे दिन-रात के शिकवे
कफ़न सरकाओ मेरी बे-ज़बानी देखते जाओ
फ़ानी बदायुनी
सूर-ओ-मंसूर-ओ-तूर अरे तौबा
एक है तेरी बात का अंदाज़
फ़ानी बदायुनी
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तर्क-ए-उम्मीद बस की बात नहीं
वर्ना उम्मीद कब बर आई है
फ़ानी बदायुनी
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