मुँह बाँध कर कली सा न रह मेरे पास तू
ख़ंदाँ हो कर के गुल की सिफ़त टुक सुख़न में आ
फ़ाएज़ देहलवी
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मुझ को औरों से कुछ नहीं है काम
तुझ से हर दम उमीद-वारी है
फ़ाएज़ देहलवी
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तेरे मिलाप बिन नहीं 'फ़ाएज़' के दिल को चैन
ज्यूँ रूह हो बसा है तू उस के बदन में आ
फ़ाएज़ देहलवी
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तुझ बदन पर जो लाल सारी है
अक़्ल उस ने मिरी बिसारी है
फ़ाएज़ देहलवी
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वो तमाशा ओ खेल होली का
सब के तन रख़्त-ए-केसरी है याद
फ़ाएज़ देहलवी
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बंद कमरे में तिरा दर्द न बुझ जाए कहीं
खिड़कियाँ खोल कि ये आग हवा चाहती है
फ़हीम जोगापुरी
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हम अहल-ए-ग़म को हक़ारत से देखने वालो
तुम्हारी नाव इन्हीं आँसुओं से चलती है
फ़हीम जोगापुरी
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