चढ़ते सूरज की मुदारात से पहले 'एजाज़'
सोच लो कितने चराग़ उस ने बुझाए होंगे
एजाज़ वारसी
दरबानों तक के चेहरे रऊनत से मस्ख़ हैं
दस्त-ए-तलब लिए हुए फिर भी खड़े हैं लोग
एजाज़ वारसी
मैं उस के ऐब उस को बताता भी किस तरह
वो शख़्स आज तक मुझे तन्हा नहीं मिला
एजाज़ वारसी
राह-रौ बच के चल दरख़्तों से
धूप दुश्मन नहीं है साए हैं
एजाज़ वारसी
बिछड़ने वाले ने वक़्त-ए-रुख़्सत कुछ इस नज़र से पलट के देखा
कि जैसे वो भी ये कह रहा हो तुम अपने घर का ख़याल रखना
एज़ाज़ अहमद आज़र
इन उजड़ी बस्तियों का कोई तो निशाँ रहे
चूल्हे जलें कि घर ही जलें पर धुआँ रहे
एज़ाज़ अहमद आज़र
वो सारी ख़ुशियाँ जो उस ने चाहीं उठा के झोली में अपनी रख लीं
हमारे हिस्से में उज़्र आए जवाज़ आए उसूल आए
एज़ाज़ अहमद आज़र

