शाम ख़ामोश है पेड़ों पे उजाला कम है
लौट आए हैं सभी एक परिंदा कम है
फ़हीम जोगापुरी
तेरी यादें हो गईं जैसे मुक़द्दस आयतें
चैन आता ही नहीं दिल को तिलावत के बग़ैर
फ़हीम जोगापुरी
तुम्हारी याद से ये रात कितनी रौशन है
नज़र में इतने हैं जुगनू कि हम गिनाएँ क्या
फ़हीम जोगापुरी
वाक़िफ़ कहाँ ज़माना हमारी उड़ान से
वो और थे जो हार गए आसमान से
फ़हीम जोगापुरी
बदलते वक़्त ने बदले मिज़ाज भी कैसे
तिरी अदा भी गई मेरा बाँकपन भी गया
फ़हीम शनास काज़मी
बस एक बार वो आया था सैर करने को
फिर उस के साथ ही ख़ुश्बू गई चमन भी गया
फ़हीम शनास काज़मी
बिछड़ के तुझ से तिरी याद भी नहीं आई
मकाँ की सम्त पलट कर मकीं नहीं आया
फ़हीम शनास काज़मी

