सब ने ग़ुर्बत में मुझ को छोड़ दिया
इक मिरी बेकसी नहीं जाती
बेदम शाह वारसी
तौर मजनूँ की निगाहों के बताते हैं हमें
इसी लैला में है इक दूसरी लैला देखो
बेदम शाह वारसी
तुम जो चाहो तो मिरे दर्द का दरमाँ हो जाए
वर्ना मुश्किल है कि मुश्किल मिरी आसाँ हो जाए
बेदम शाह वारसी
वो क़ुलक़ुल-ए-मीना में चर्चे मिरी तौबा के
और शीशा-ओ-साग़र की मय-ख़ाने में सरगोशी
बेदम शाह वारसी
वो ले गया है मिरी आँख अपनी बस्ती में
कि मेरे साथ रहे राब्ता बहाल उस का
बेदार सरमदी
भूक चेहरों पे लिए चाँद से प्यारे बच्चे
बेचते फिरते हैं गलियों में ग़ुबारे बच्चे
बेदिल हैदरी
गर्मी लगी तो ख़ुद से अलग हो के सो गए
सर्दी लगी तो ख़ुद को दोबारा पहन लिया
बेदिल हैदरी

