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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

कोई फूल सा हाथ काँधे पे था
मिरे पाँव शो'लों पे जलते रहे

बशीर बद्र




लोबान में चिंगारी जैसे कोई रख जाए
यूँ याद तिरी शब भर सीने में सुलगती है

बशीर बद्र




लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

बशीर बद्र




मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा
आग से आग बुझा फूल खिला जाम उठा

बशीर बद्र




महक रही है ज़मीं चाँदनी के फूलों से
ख़ुदा किसी की मोहब्बत पे मुस्कुराया है

बशीर बद्र




महलों में हम ने कितने सितारे सजा दिए
लेकिन ज़मीं से चाँद बहुत दूर हो गया

बशीर बद्र




मैं बोलता हूँ तो इल्ज़ाम है बग़ावत का
मैं चुप रहूँ तो बड़ी बेबसी सी होती है

बशीर बद्र