है दिल में घर को शहर से सहरा में ले चलें
उठवा के आँसुओं से दर-ओ-बाम दोश पर
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
इस बज़्म में पूछे न कोई मुझ से कि क्या हूँ
जो शीशा गिरे संग पे मैं उस की सदा हूँ
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
इश्क़ में बू है किबरियाई की
आशिक़ी जिस ने की ख़ुदाई की
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
इश्क़ ने मंसब लिखे जिस दिन मिरी तक़दीर में
दाग़ की नक़दी मिली सहरा मिला जागीर में
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
काबा तो संग-ओ-ख़िश्त से ऐ शैख़ मिल बना
कुछ संग बच रहा था सो उस बुत का दिल बना
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
कल के दिन जो गिर्द मय-ख़ाने के फिरते थे ख़राब
आज मस्जिद में जो देखा साहब-ए-सज्जादा हैं
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
ख़ाल-ए-लब आफ़त-ए-जाँ था मुझे मालूम न था
दाम दाने में निहाँ था मुझे मालूम न था
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

