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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

ख़्वाहिश-ए-सूद थी सौदे में मोहब्बत के वले
सर-ब-सर इस में ज़ियाँ था मुझे मालूम न था

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'




क्या तुझ को लिखूँ ख़त हरकत हाथ से गुम है
ख़ामा भी मिरे हाथ में अंगुश्त-ए-शशुम है

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'




मत तंग हो करे जो फ़लक तुझ को तंग-दस्त
आहिस्ता खींचिए जो दबे ज़ेर-ए-संग दस्त

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'




क़लम सिफ़त में पस-अज़-मरातिब बदन सना में तिरी खपाया
बदन ज़बाँ में ज़बाँ सुख़न में सुख़न सना में तिरी खपाया

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'




रुश्द-ए-बातिन की तलब है तो कर ऐ शैख़ वो काम
पीर-ए-मय-ख़ाना जो ज़ाहिर में कुछ इरशाद करे

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'




सैलाब से आँखों के रहते हैं ख़राबे में
टुकड़े जो मिरे दिल के बस्ते हैं दो-आबे में

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'




उल्फ़त में तिरी ऐ बुत-ए-बे-मेहर-ओ-मोहब्बत
आया हमें इक हाथ से ताली का बजाना

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'