घर भी वीराना लगे ताज़ा हवाओं के बग़ैर
बाद-ए-ख़ुश-रंग चले दश्त भी घर लगता है
बख़्श लाइलपूरी
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हमारे ख़्वाब चोरी हो गए हैं
हमें रातों को नींद आती नहीं है
बख़्श लाइलपूरी
हुसूल-ए-मंज़िल-ए-जाँ का हुनर नहीं आया
वो रौशनी थी कि कुछ भी नज़र नहीं आया
बख़्श लाइलपूरी
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कभी आँखों पे कभी सर पे बिठाए रखना
ज़िंदगी तल्ख़ सही दिल से लगाए रखना
बख़्श लाइलपूरी
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कोई शय दिल को बहलाती नहीं है
परेशानी की रुत जाती नहीं है
बख़्श लाइलपूरी
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वही पत्थर लगा है मेरे सर पर
अज़ल से जिस को सज्दे कर रहा हूँ
बख़्श लाइलपूरी
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आइने में है फिर वही सूरत
यूँ ही होती है तर्जुमानी क्या
बकुल देव
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