रिश्ता-ए-उल्फ़त रग-ए-जाँ में बुतों का पड़ गया
अब ब-ज़ाहिर शग़्ल है ज़ुन्नार का फ़े'अल-ए-अबस
बहराम जी
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यार को हम ने बरमला देखा
आश्कारा कहीं छुपा देखा
बहराम जी
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ज़ाहिदा काबे को जाता है तो कर याद-ए-ख़ुदा
फिर जहाज़ों में ख़याल-ए-ना-ख़ुदा करता है क्यूँ
बहराम जी
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ज़ाहिरी वाज़ से है क्या हासिल
अपने बातिन को साफ़ कर वाइज़
बहराम जी
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धूप बढ़ते ही जुदा हो जाएगा
साया-ए-दीवार भी दीवार से
बहराम तारिक़
अहल-ए-ज़र ने देख कर कम-ज़रफ़ी-ए-अहल-ए-क़लम
हिर्स-ए-ज़र के हर तराज़ू में सुख़न-वर रख दिए
बख़्श लाइलपूरी
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दर्द-ए-हिजरत के सताए हुए लोगों को कहीं
साया-ए-दर भी नज़र आए तो घर लगता है
बख़्श लाइलपूरी

