जा-ब-जा हम को रही जल्वा-ए-जानाँ की तलाश
दैर-ओ-काबा में फिरे सोहबत-ए-रहबाँ में रहे
बहराम जी
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कहीं ख़ालिक़ हुआ कहीं मख़्लूक़
कहीं बंदा कहीं ख़ुदा देखा
बहराम जी
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कहता है यार जुर्म की पाते हो तुम सज़ा
इंसाफ़ अगर नहीं है तो बे-दाद भी नहीं
बहराम जी
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मैं बरहमन ओ शैख़ की तकरार से समझा
पाया नहीं उस यार को झुँझलाए हुए हैं
बहराम जी
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नहीं बुत-ख़ाना ओ काबा पे मौक़ूफ़
हुआ हर एक पत्थर में शरर बंद
बहराम जी
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नहीं दुनिया में आज़ादी किसी को
है दिन में शम्स और शब को क़मर बंद
बहराम जी
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पता मिलता नहीं उस बे-निशाँ का
लिए फिरता है क़ासिद जा-ब-जा ख़त
बहराम जी

