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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

हम ने घर की सलामती के लिए
ख़ुद को घर से निकाल रक्खा है

अज़हर अदीब




हम उन की आस पे उम्रें गुज़ार देते हैं
वो मो'जिज़े जो कभी रूनुमा नहीं होते

अज़हर अदीब




हमारे नाम की तख़्ती भी उन पे लग न सकी
लहू में गूँध के मिट्टी जो घर बनाए गए

अज़हर अदीब




हमें रोको नहीं हम ने बहुत से काम करने हैं
किसी गुल में महकना है किसी बादल में रहना है

अज़हर अदीब




हवा को ज़िद कि उड़ाएगी धूल हर सूरत
हमें ये धुन है कि आईना साफ़ करना है

अज़हर अदीब




इस लिए मैं ने मुहाफ़िज़ नहीं रक्खे अपने
मिरे दुश्मन मिरे इस जिस्म से बाहर कम हैं

अज़हर अदीब




इतना भी इंहिसार मिरे साए पर न कर
क्या जाने कब ये मोम की दीवार गिर पड़े

अज़हर अदीब