ज़िंदगी मुझ को मिरी नज़रों में शर्मिंदा न कर
मर चुका है जो बहुत पहले उसे ज़िंदा न कर
अक़ील शादाब
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नज़र गुम हो गई जल्वों में 'आरिफ़'
अँधेरा कर दिया है रौशनी ने
आरिफ़ अब्बासी
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फूँक कर मैं ने आशियाने को
रौशनी बख़्श दी ज़माने को
आरिफ़ अब्बासी
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चाँद मेरे घर में उतरा था कहीं डूबा न था
ऐ मिरे सूरज अभी आना तिरा अच्छा न था
आरिफ़ अब्दुल मतीन
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हमीं ने रास्तों की ख़ाक छानी
हमीं आए हैं तेरे पास चल के
आरिफ़ अब्दुल मतीन
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कभी ख़याल के रिश्तों को भी टटोल के देख
मैं तुझ से दूर सही तुझ से कुछ जुदा भी नहीं
आरिफ़ अब्दुल मतीन
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था ए'तिमाद-ए-हुस्न से तू इस क़दर तही
आईना देखने का तुझे हौसला न था
आरिफ़ अब्दुल मतीन
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