अपने ही पैरों से अपना-आप रौंद
अपनी हस्ती को मिटा कर रक़्स कर
आरिफ़ इमाम
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बना रहा हूँ अभी घर को आइना-ख़ाना
फिर अपने हाथ में पत्थर भी देखना है मुझे
आरिफ़ इमाम
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एक पर्दा है बे-सबाती का
आइने और तिरे जमाल के बीच
आरिफ़ इमाम
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हवस न जान तुझे छू के देखना ये है
तुझे ही देख रहे हैं कि ख़्वाब देखते हैं
आरिफ़ इमाम
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इक बरस हो गया उसे देखे
इक सदी आ गई है साल के बीच
आरिफ़ इमाम
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ख़ून कितना बहा था मक़्तल में
मेरी आँखों में ख़ून उतरने तक
आरिफ़ इमाम
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सुबू में अक्स-ए-रुख़-ए-माहताब देखते हैं
शराब पीते नहीं हम शराब देखते हैं
आरिफ़ इमाम
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