तीरा-ओ-तार ख़लाओं में भटकता रहा ज़ेहन
रात सहरा-ए-अना से मैं हिरासाँ गुज़रा
आरिफ़ अब्दुल मतीन
तितलियाँ रंगों का महशर हैं कभी सोचा न था
उन को छूने पर खुला वो राज़ जो खुलता न था!
आरिफ़ अब्दुल मतीन
वफ़ा निगाह की तालिब है इम्तिहाँ की नहीं
वो मेरी रूह में झाँके न आज़माए मुझे
आरिफ़ अब्दुल मतीन
ज़ात का आईना जब देखा तो हैरानी हुई
मैं न था गोया कोई मुझ सा था मेरे रू-ब-रू
आरिफ़ अब्दुल मतीन
मुझ को जन्नत से उठा कर ये कहाँ फेंक दिया
अपने मस्कन से बहुत दूर रहूँगा कैसे
आरिफ़ अंसारी
अभी तो मैं ने फ़क़त बारिशों को झेला है
अब इस के ब'अद समुंदर भी देखना है मुझे
आरिफ़ इमाम
अजब था नश्शा-ए-वारफ़तगी-ए-वस्ल उसे
वो ताज़ा-दम रहा मुझ को निढाल कर के भी
आरिफ़ इमाम

