तलाश-ए-रिज़्क़ का ये मरहला अजब है कि हम
घरों से दूर भी घर के लिए बेस हुए हैं
आरिफ़ इमाम
तुम्हारे हिज्र में मरना था कौन सा मुश्किल
तुम्हारे हिज्र में ज़िंदा हैं ये कमाल किया
आरिफ़ इमाम
उसी की बात लिखी चाहे कम लिखी हम ने
उसी का ज़िक्र किया चाहे ख़ाल-ख़ाल किया
आरिफ़ इमाम
ये मिट्टी मेरे ख़ाल-ओ-ख़द चुरा कर
तिरा चेहरा बनाती जा रही है
आरिफ़ इमाम
'आरिफ़'-हुसैन धोका सही अपनी ज़िंदगी
इस ज़िंदगी के ब'अद की हालत भी है फ़रेब
आरिफ़ शफ़ीक़
अंधे अदम वजूद के गिर्दाब से निकल
ये ज़िंदगी भी ख़्वाब है तू ख़्वाब से निकल
आरिफ़ शफ़ीक़
अपने दरवाज़े पे ख़ुद ही दस्तकें देता है वो
अजनबी लहजे में फिर वो पूछता है कौन है
आरिफ़ शफ़ीक़

