मैं अपने आप को किस तरह संगसार करूँ
मिरे ख़िलाफ़ मिरा दिल अगर गवाही दे
अक़ील शादाब
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मिरी तलाश में है कोई ऐसा लगता है
किसी का गुम-शुदा 'शादाब' रख़्त हूँ शायद
अक़ील शादाब
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मुझे किसी ने सुना ही नहीं तवज्जोह से
मैं बद-ज़बान सदा-ए-करख़्त हूँ शायद
अक़ील शादाब
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शायद कोई कमी मेरे अंदर कहीं पे है
मैं आसमाँ पे हूँ मिरा साया ज़मीं पे है
अक़ील शादाब
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था जिस पे मेरी ज़िंदगी का इंहिसार
उसी का नाम ध्यान में नहीं रहा
अक़ील शादाब
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ये और बात कि वो अब यहाँ नहीं रहता
मगर ये उस का बसाया हुआ मकान तो है
अक़ील शादाब
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ज़िंदगी जिस के तसव्वुर में बसर की हम ने
हाए वो शख़्स हक़ीक़त में कहानी निकला
अक़ील शादाब
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