पी जाते हैं ज़हर-ए-ग़म-ए-हस्ती हो कि मय हो
हम सा भी ज़माने में बला-नोश न होगा
अंजुम रूमानी
क़लंदरी है कि रखता है दिल ग़नी 'अंजुम'
कोई दुकाँ न कोई कार-ख़ाना रखता है
अंजुम रूमानी
रहे ज़रा दिल-ए-ख़ूँ-गश्ता पर नज़र 'अंजुम'
उसी सदफ़ से अजब क्या गुहर निकल आए
अंजुम रूमानी
सच के सौदे में न पड़ना कि ख़सारा होगा
जो हुआ हाल हमारा सो तुम्हारा होगा
अंजुम रूमानी
समझी गई जो बात हमारी ग़लत तो क्या
याँ तर्जुमा कुछ और है आयत कुछ और है
अंजुम रूमानी
ये जितने मसअले हैं मश्ग़ले हैं सब फ़राग़त के
न तुम बे-कार बैठे हो न हम बे-कार बैठे हैं
अंजुम रूमानी
आँख खुल कर अभी मानूस नहीं हो पाती
और दीवार से तस्वीर बदल जाती है
अंजुम सलीमी

