तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए
मैं ज़हर खा रही थी कि तुम याद गए
अंजुम रहबर
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आएगी हम को रास न यक-रंगी-ए-ख़ला
अहल-ए-ज़मीं हैं हम हमें दिन रात चाहिए
अंजुम रूमानी
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आज का झगड़ा आज चुका
कल की बातें कल पर टाल
अंजुम रूमानी
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और कुछ दिन ख़राब हो लीजे
सूद अपना है इस ज़ियाँ में अभी
अंजुम रूमानी
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देखोगे तो आएगी तुम्हें अपनी जफ़ा याद
ख़ामोश जिसे पाओगे ख़ामोश न होगा
अंजुम रूमानी
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देते नहीं सुझाई जो दुनिया के ख़त्त-ओ-ख़ाल
आए हैं तीरगी में मगर रौशनी से हम
अंजुम रूमानी
दिल से उठता है सुब्ह-ओ-शाम धुआँ
कोई रहता है इस मकाँ में अभी
अंजुम रूमानी

