एक ताबीर की सूरत नज़र आई है इधर
सो उठा लाया हूँ सब ख़्वाब पुराने वाले
अंजुम सलीमी
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हाँ ज़माने की नहीं अपनी तो सुन सकता था
काश ख़ुद को ही कभी बैठ के समझाता मैं
अंजुम सलीमी
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हर तरफ़ तू नज़र आता है जिधर जाता हूँ
तेरे इम्कान से हिजरत नहीं कर सकता मैं
अंजुम सलीमी
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हिज्र को बीच में नहीं छोड़ा
सब से पहले उसे तमाम किया
अंजुम सलीमी
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हिज्र में भी हम एक दूसरे के
आमने सामने पड़े हुए थे
अंजुम सलीमी
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इश्क़ फ़रमा लिया तो सोचता हूँ
क्या मुसीबत पड़ी हुई थी मुझे
अंजुम सलीमी
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इतना बे-ताब न हो मुझ से बिछड़ने के लिए
तुझ को आँखों से नहीं दिल से जुदा करना है
अंजुम सलीमी
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