वो मेरी राह में पत्थर की तरह रहता है
वो मेरी राह से पत्थर हटा भी देता है
अंजना संधीर
चमक उठे हैं थपेड़ों की चोट से क़तरे
सदफ़ की गोद में 'अंजुम' गुहर नहीं आए
अंजुम अंसारी
हर एक मोड़ से पूछा है मंज़िलों का पता
सफ़र तमाम हुआ रहबर नहीं आए
अंजुम अंसारी
कितने ही दाएरों में बटा मरकज़-ए-ख़याल
इक बुत के हम ने सैकड़ों पैकर बना दिए
अंजुम अंसारी
बाहर झूम रहा था मौसम फूलों का
अंदर रूठी थी हरियाली करते क्या
अंजुम अज़ीमाबादी
सर सलामत है तो रौज़न भी बना लूँगा मैं
हब्स तेरे दर-ओ-दीवार से वाक़िफ़ मैं हूँ
अंजुम अज़ीमाबादी
तुम हवस-परस्तों के सैंकड़ों ख़ुदा ठहरे
एक है ख़ुदा अपना दूसरा नहीं रखते
अंजुम अज़ीमाबादी

