ख़ाली भी तो कर ख़ाना-ए-दिल दुनिया से
इस घर में मिरी जान ख़ुदा आएगा
अंजुम आज़मी
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कोई तो ख़ैर का पहलू भी निकले
अकेला किस तरह ये शर रहेगा
अंजुम आज़मी
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क्यूँ हुआ मुझ को इनायत की नज़र का सौदा
आज रुस्वाई ही रुस्वाई है कुछ और नहीं
अंजुम आज़मी
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मेरी दुनिया में अभी रक़्स-ए-शरर होता है
जो भी होता है ब-अंदाज़-ए-दिगर होता है
अंजुम आज़मी
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निकलो भी कभी सूद-ओ-ज़ियाँ से वर्ना
कूचे में तिरे कौन भला आएगा
अंजुम आज़मी
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तुझ से पर्दा नहीं मिरे ग़म का
तू मिरी ज़िंदगी का महरम है
अंजुम आज़मी
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ऐ आसमान हर्फ़ को फिर ए'तिबार दे
वर्ना हक़ीक़तों को कहानी लिखेंगे लोग
अंजुम बाराबंकवी
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