कैसा अजीब वक़्त है कोई भी हम-सफ़र नहीं
धूप भी मो'तबर नहीं साया भी मो'तबर नहीं
अनीस देहलवी
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करना है आप को जो नए रास्तों की खोज
सब जिस तरफ़ न जाएँ उधर जाना चाहिए
अनीस देहलवी
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निगाह चाहिए बस अहल-ए-दिल फ़क़ीरों की
बुरा भी देखूँ तो मुझ को भला नज़र आए
अनीस देहलवी
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पता इस का तो हम रिंदों से पूछो
ख़ुदा को कब ये साधू जानता है
अनीस देहलवी
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सहरा से चले आ भी गए दार-ओ-रसन तक
होना था जिन्हें वो न हमारे हुए लोगो
अनीस देहलवी
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उड़ा गए हैं बहुत धूल जाने वाले लोग
छटे ग़ुबार तो कुछ रास्ता नज़र आए
अनीस देहलवी
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उस बेवफ़ा पे मरने को आमादा दिल नहीं
लेकिन वफ़ा की ज़िद है कि मर जाना चाहिए
अनीस देहलवी
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