उस की मुट्ठी में जवाहिर थे नज़र मेरी तरफ़
और मुझे पैराया-ए-अर्ज़-ए-हुनर आता न था
अनीस अशफ़ाक़
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ये ख़ाना हमेशा से वीरान है
कहाँ कोई दिल के मकाँ में रहा
अनीस अशफ़ाक़
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आज इंसाँ को तपते सहरा में
बहता दरिया तलाश करना है
अनीस अब्र
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'अब्र' दुनिया को छोड़ जाने का
इक बहाना तलाश करना है
अनीस अब्र
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क्यूँ हाथ दिल से लगाते हो बार बार अपना
क्या दिल में अब भी कोई बे-नज़ीर रहता है
अनीस अब्र
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लफ़्ज़ यूँ ख़ामुशी से लड़ते हैं
जिस तरह ग़म हँसी से लड़ते हैं
अनीस अब्र
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मैं मुस्कुराता मगर दी न अश्क ने मोहलत
ख़ुशी जब एक मिली साथ ग़म हज़ार मिले
अनीस अब्र
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