जो परिंदे उड़ नहीं सकते अब उन की ख़ैर हो
आने वाला है इसी जानिब शिकारी हाए हाए
अनीस अंसारी
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कभी दरवेश के तकिया में भी आ कर देखो
तंग-दस्ती में भी आराम मयस्सर निकला
अनीस अंसारी
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लाश क़ातिल ने खुली फेंक दी चौराहे पर
देखने वाला कोई घर से न बाहर निकला
अनीस अंसारी
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मैं ने आँखों में जला रखा है आज़ादी का तेल
मत अंधेरों से डरा रख कि मैं जो हूँ सो हूँ
अनीस अंसारी
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नाम तेरा भी रहेगा न सितमगर बाक़ी
जब है फ़िरऔन न चंगेज़ का लश्कर बाक़ी
अनीस अंसारी
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तिरी आँखों ने धोया है मुझे यूँ
मैं बिल्कुल साफ़-सुथरा हो गया हूँ
अनीस अंसारी
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तिरी महफ़िल में सब बैठे हैं आ कर
हमारा बैठना दुश्वार क्यूँ है
अनीस अंसारी
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