ख़त हो कोई किताब हो या दिल का ज़ख़्म हो
जो भी है मेरे पास निशानी उसी की है
सदार आसिफ़
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ख़त हो कोई किताब हो या दिल का ज़ख़्म हो
जो भी है मेरे पास निशानी उसी की है
सदार आसिफ़
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ख़ता उस की मुआफ़ी से बड़ी है
मैं क्या करता सज़ा देनी पड़ी है
सदार आसिफ़
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कोई शिकवा नहीं हम को किसी से
ख़ुद अपनी ज़ात हम को छल रही है
सदार आसिफ़
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कोई शिकवा नहीं हम को किसी से
ख़ुद अपनी ज़ात हम को छल रही है
सदार आसिफ़
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मैं ख़ुद को देखूँ अगर दूसरे की आँखों से
मिलेंगी ख़ामियाँ अपने ही शाह-कारों में
सदार आसिफ़
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मैं तुझ से झुक के मिला हूँ मगर ये ध्यान रहे
बड़ा नहीं हूँ मगर तुझ से क़द में कम भी नहीं
सदार आसिफ़
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