सोने वालों को क्या ख़बर ऐ हिज्र
क्या हुआ एक शब में क्या न हुआ
साक़िब लखनवी
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सुनने वाले रो दिए सुन कर मरीज़-ए-ग़म का हाल
देखने वाले तरस खा कर दुआ देने लगे
साक़िब लखनवी
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उस के सुनने के लिए जम'अ हुआ है महशर
रह गया था जो फ़साना मिरी रुस्वाई का
साक़िब लखनवी
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उस के सुनने के लिए जम'अ हुआ है महशर
रह गया था जो फ़साना मिरी रुस्वाई का
साक़िब लखनवी
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ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था
हमीं सो गए दास्ताँ कहते कहते
साक़िब लखनवी
चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ाएँ
न तुम याद आओ न हम याद आएँ
सरदार अंजुम
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चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ाएँ
न तुम याद आओ न हम याद आएँ
सरदार अंजुम
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