आशिक़-मिज़ाज रहते हैं हर वक़्त ताक में
सीना को इस तरह से उभारा न कीजिए
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
आशिक़-मिज़ाज रहते हैं हर वक़्त ताक में
सीना को इस तरह से उभारा न कीजिए
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
ऐ शैख़ अपना जुब्बा-ए-अक़्दस सँभालिये
मस्त आ रहे हैं चाक गरेबाँ किए हुए
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
ऐ शैख़ ये जो मानें का'बा ख़ुदा का घर है
बुत-ख़ाना में बता तू फिर कौन जल्वा-गर है
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
ऐ शैख़ ये जो मानें का'बा ख़ुदा का घर है
बुत-ख़ाना में बता तू फिर कौन जल्वा-गर है
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
भूल कर ले गया सू-ए-मंज़िल
ऐसे रहज़न को रहनुमा कहिए
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
चाहने वालों को चाहा चाहिए
जो न चाहे फिर उसे क्या चाहिए
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

