मयस्सर ख़ुद निगह-दारी की आसाइश नहीं रहती
मोहब्बत में तो पेश-ओ-पस की गुंजाइश नहीं रहती
साइमा इसमा
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न-जाने कैसी निगाहों से मौत ने देखा
हुई है नींद से बेदार ज़िंदगी कि मैं हूँ
साइमा इसमा
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नक़्श जब ज़ख़्म बना ज़ख़्म भी नासूर हुआ
जा के तब कोई मसीहाई पे मजबूर हुआ
साइमा इसमा
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हम को पहले भी न मिलने की शिकायत कब थी
अब जो है तर्क-ए-मरासिम का बहाना हम से
साजिद अमजद
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और इक चोट दीजिए मुझ को!
मेरी तकलीफ़ ना-मुकम्मल है
साजिद असर
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ऐसी आग फ़लक से बरसेगी इक दिन
ख़ाक हवा पानी पत्थर जल जाएँगे
साजिद हमीद
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दर्द इतना भी नहीं है कि छुपा भी न सकूँ
बोझ ऐसा भी नहीं है कि उठा भी न सकूँ
साजिद हमीद
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