क़रीब-ए-नज़'अ भी क्यूँ चैन ले सके कोई
नक़ाब रुख़ से उठा लो तुम्हें किसी से क्या
सैफ़ुद्दीन सैफ़
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क़रीब-ए-नज़'अ भी क्यूँ चैन ले सके कोई
नक़ाब रुख़ से उठा लो तुम्हें किसी से क्या
सैफ़ुद्दीन सैफ़
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रात गुज़रे न दर्द-ए-दिल ठहरे
कुछ तो बढ़ जाए कुछ तो घट जाए
सैफ़ुद्दीन सैफ़
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'सैफ़' अंदाज़-ए-बयाँ रंग बदल देता है
वर्ना दुनिया में कोई बात नई बात नहीं
सैफ़ुद्दीन सैफ़
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'सैफ़' पी कर भी तिश्नगी न गई
अब के बरसात और ही कुछ थी
सैफ़ुद्दीन सैफ़
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'सैफ़' पी कर भी तिश्नगी न गई
अब के बरसात और ही कुछ थी
सैफ़ुद्दीन सैफ़
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शायद तुम्हारे साथ भी वापस न आ सकें
वो वलवले जो साथ तुम्हारे चले गए
सैफ़ुद्दीन सैफ़
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