उस मुसाफ़िर की नक़ाहत का ठिकाना क्या है
संग-ए-मंज़िल जिसे दीवार नज़र आने लगे
सैफ़ुद्दीन सैफ़
ये आलाम-ए-हस्ती ये दौर-ए-ज़माना
तो क्या अब तुम्हें भूल जाना पड़ेगा
सैफ़ुद्दीन सैफ़
ज़िंदगी किस तरह कटेगी 'सैफ़'
रात कटती नज़र नहीं आती
सैफ़ुद्दीन सैफ़
आज सोचा है कि ख़ुद रस्ते बनाना सीख लूँ
इस तरह तो उम्र सारी सोचती रह जाऊँगी
साइमा इसमा
ऐसा क्या अंधेर मचा है मेरे ज़ख़्म नहीं भरते
लोग तो पारा पारा हो कर जुड़ जाते हैं लम्हे में
साइमा इसमा
जाने फिर मुँह में ज़बाँ रखने का मसरफ़ क्या है
जो कहा चाहते हैं वो तो नहीं कह सकते
साइमा इसमा
कभी कभी तो अच्छा-ख़ासा चलते चलते
यूँ लगता है आगे रस्ता कोई नहीं है
साइमा इसमा

