हमें न रास ज़माने की महफ़िलें आई
चलो कि छोड़ के अब इस जहाँ को चलते हैं
सदा अम्बालवी
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इक न इक रोज़ रिफ़ाक़त में बदल जाएगी
दुश्मनी को भी सलीक़े से निभाते जाओ
सदा अम्बालवी
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इक न इक रोज़ रिफ़ाक़त में बदल जाएगी
दुश्मनी को भी सलीक़े से निभाते जाओ
सदा अम्बालवी
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कौन आएगा भूल कर रस्ता
दिल को क्यूँ ज़िद है घर सजाने की
सदा अम्बालवी
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क्यूँ सदा पहने वो तेरा ही पसंदीदा लिबास
कुछ तो मौसम के मुताबिक़ भी सँवरना है उसे
सदा अम्बालवी
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क्यूँ सदा पहने वो तेरा ही पसंदीदा लिबास
कुछ तो मौसम के मुताबिक़ भी सँवरना है उसे
सदा अम्बालवी
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लोग कहते हैं दिल लगाना जिसे
रोग वो भी लगा के देख लिया
सदा अम्बालवी
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