'ज़फ़र' है बेहतरी इस में कि मैं ख़मोश रहूँ
खुले ज़बान तो इज़्ज़त किसी की क्या रह जाए
साबिर ज़फ़र
'ज़फ़र' है बेहतरी इस में कि मैं ख़मोश रहूँ
खुले ज़बान तो इज़्ज़त किसी की क्या रह जाए
साबिर ज़फ़र
'ज़फ़र' वहाँ कि जहाँ हो कोई भी हद क़ाएम
फ़क़त बशर नहीं होता ख़ुदा भी होता है
साबिर ज़फ़र
अब कहाँ दोस्त मिलें साथ निभाने वाले
सब ने सीखे हैं अब आदाब ज़माने वाले
सदा अम्बालवी
अब कहाँ दोस्त मिलें साथ निभाने वाले
सब ने सीखे हैं अब आदाब ज़माने वाले
सदा अम्बालवी
अपनी उर्दू तो मोहब्बत की ज़बाँ थी प्यारे
अब सियासत ने उसे जोड़ दिया मज़हब से
सदा अम्बालवी
बड़ा घाटे का सौदा है 'सदा' ये साँस लेना भी
बढ़े है उम्र ज्यूँ-ज्यूँ ज़िंदगी कम होती जाती है
सदा अम्बालवी

