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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

वो क्यूँ न रूठता मैं ने भी तो ख़ता की थी
बहुत ख़याल रखा था बहुत वफ़ा की थी

साबिर ज़फ़र




वो लोग आज ख़ुद इक दास्ताँ का हिस्सा हैं
जिन्हें अज़ीज़ थे क़िस्से कहानियाँ और फूल

साबिर ज़फ़र




वो लोग आज ख़ुद इक दास्ताँ का हिस्सा हैं
जिन्हें अज़ीज़ थे क़िस्से कहानियाँ और फूल

साबिर ज़फ़र




यहाँ है धूप वहाँ साए हैं चले जाओ
ये लोग लेने तुम्हें आए हैं चले जाओ

साबिर ज़फ़र




ये इब्तिदा थी कि मैं ने उसे पुकारा था
वो आ गया था 'ज़फ़र' उस ने इंतिहा की थी

साबिर ज़फ़र




ये इब्तिदा थी कि मैं ने उसे पुकारा था
वो आ गया था 'ज़फ़र' उस ने इंतिहा की थी

साबिर ज़फ़र




ये ज़ख़्म-ए-इश्क़ है कोशिश करो हरा ही रहे
कसक तो जा न सकेगी अगर ये भर भी गया

साबिर ज़फ़र