चाँदनी रातों में चिल्लाता फिरा
चाँद सी जिस ने वो सूरत देख ली
रिन्द लखनवी
दीद-ए-लैला के लिए दीदा-ए-मजनूँ है ज़रूर
मेरी आँखों से कोई देखे तमाशा तेरा
रिन्द लखनवी
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दीवानों से कह दो कि चली बाद-ए-बहारी
क्या अब के बरस चाक गरेबाँ न करेंगे
रिन्द लखनवी
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दीवानों से कह दो कि चली बाद-ए-बहारी
क्या अब के बरस चाक गरेबाँ न करेंगे
रिन्द लखनवी
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हम जो कहते हैं सरासर है ग़लत
सब बजा आप जो फ़रमाइएगा
रिन्द लखनवी
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हिज्र की शब हाथ में ले कर चराग़-ए-माहताब
ढूँढता फिरता हूँ गर्दूं पर सहर मिलती नहीं
रिन्द लखनवी
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हिज्र की शब हाथ में ले कर चराग़-ए-माहताब
ढूँढता फिरता हूँ गर्दूं पर सहर मिलती नहीं
रिन्द लखनवी
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