लाएगी गर्दिश में तुझ को भी मिरी आवारगी
कू-ब-कू मैं हूँ तो तू भी दर-ब-दर हो जाएगा
रिन्द लखनवी
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लैला मजनूँ का रटती है नाम
दीवानी हुई है बक रही है
रिन्द लखनवी
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मय पिला ऐसी कि साक़ी न रहे होश मुझे
एक साग़र से दो आलम हों फ़रामोश मुझे
रिन्द लखनवी
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मय-कश हूँ वो कि पूछता हूँ उठ के हश्र में
क्यूँ जी शराब की हैं दुकानें यहाँ कहीं
रिन्द लखनवी
मय-कश हूँ वो कि पूछता हूँ उठ के हश्र में
क्यूँ जी शराब की हैं दुकानें यहाँ कहीं
रिन्द लखनवी
मौत आ जाए क़ैद में सय्याद
आरज़ू हो अगर रिहाई की
रिन्द लखनवी
मज़ा पड़ा है क़नाअत का अहद-ए-तिफ़्ली से
मैं सेर हो के न पीता था शीर-ए-मादर को
रिन्द लखनवी
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