ऐ परी हुस्न तिरा रौनक़-ए-हिंदुस्ताँ है
हुस्न-ए-यूसुफ़ है फ़क़त मिस्र के बाज़ार का रूप
रिन्द लखनवी
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ऐ शब-ए-फ़ुर्क़त न कर मुझ पर अज़ाब
मैं ने तेरा मुँह नहीं काला किया
रिन्द लखनवी
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बरहना देख कर आशिक़ में जान-ए-ताज़ा आती है
सरापा रूह का आलम है तेरे जिस्म-ए-उर्यां में
रिन्द लखनवी
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बरहना देख कर आशिक़ में जान-ए-ताज़ा आती है
सरापा रूह का आलम है तेरे जिस्म-ए-उर्यां में
रिन्द लखनवी
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बस अब आप तशरीफ़ ले जाइए
जो गुज़रेगी मुझ पर गुज़र जाएगी
रिन्द लखनवी
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बुत करें आरज़ू ख़ुदाई की
शान है तेरी किबरियाई की
रिन्द लखनवी
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चाँदनी रातों में चिल्लाता फिरा
चाँद सी जिस ने वो सूरत देख ली
रिन्द लखनवी

