करीम जो मुझे देता है बाँट खाता हूँ
मिरे तरीक़ में तन्हा-ख़ोरी हलाल नहीं
रिन्द लखनवी
ख़ाक छनवाती है दीवानों से अपने मुद्दतों
वो परी जब तक न कर ले दर-ब-दर मिलती नहीं
रिन्द लखनवी
खुली है कुंज-ए-क़फ़स में मिरी ज़बाँ सय्याद
मैं माजरा-ए-चमन क्या करूँ बयाँ सय्याद
रिन्द लखनवी
खुली है कुंज-ए-क़फ़स में मिरी ज़बाँ सय्याद
मैं माजरा-ए-चमन क्या करूँ बयाँ सय्याद
रिन्द लखनवी
किसी का कोई मर जाए हमारे घर में मातम है
ग़रज़ बारह महीने तीस दिन हम को मोहर्रम है
रिन्द लखनवी
क्या मिला अर्ज़-ए-मुद्दआ कर के
बात भी खोई इल्तिजा कर के
रिन्द लखनवी
क्या सुन चुके हैं आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहार हाथ
जाते हैं सू-ए-जेब जो बे-इख़्तियार हाथ
रिन्द लखनवी

