ज़मीं के लोग तो क्या दो दिलों की चाहत में
ख़ुदा भी हो तो उसे दरमियान लाओ मत
उबैदुल्लाह अलीम
ज़मीन जब भी हुई कर्बला हमारे लिए
तो आसमान से उतरा ख़ुदा हमारे लिए
उबैदुल्लाह अलीम
ख़ुदा आख़िर करेगा ख़ुश मिरा दिल
मुझे अपने तवक्कुल की क़सम है
उबैदुल्लाह ख़ाँ मुब्तला
रास्ती से तुझ कूँ करना है निबाह
हाथ जो पकड़ा मिरा दहना सजन
उबैदुल्लाह ख़ाँ मुब्तला
सोहबत न रख अग़्यार सूँ बेज़ार मत कर यार कूँ
जाता रहेगा हाथ सूँ उस की निगहबानी करो
उबैदुल्लाह ख़ाँ मुब्तला
इसी फ़लक से उतरता है ये अंधेरा भी
ये रौशनी भी इसी आसमाँ से आती है
उबैदुल्लह सिद्दीक़ी
पहले चिंगारी से इक शोला बनाता है मुझे
फिर वही तेज़ हवाओं से डराता है मुझे
उबैदुल्लह सिद्दीक़ी

