कल मातम बे-क़ीमत होगा आज उन की तौक़ीर करो
देखो ख़ून-ए-जिगर से क्या क्या लिखते हैं अफ़्साने लोग
उबैदुल्लाह अलीम
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खा गया इंसाँ को आशोब-ए-मआश
आ गए हैं शहर बाज़ारों के बीच
उबैदुल्लाह अलीम
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ख़ुर्शीद मिसाल शख़्स कल शाम
मिट्टी के सुपुर्द कर दिया है
उबैदुल्लाह अलीम
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ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूँ
काश तुझ को भी इक झलक देखूँ
उबैदुल्लाह अलीम
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कोई और तो नहीं है पस-ए-ख़ंजर-आज़माई
हमीं क़त्ल हो रहे हैं हमीं क़त्ल कर रहे हैं
उबैदुल्लाह अलीम
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मैं एक से किसी मौसम में रह नहीं सकता
कभी विसाल कभी हिज्र से रिहाई दे
उबैदुल्लाह अलीम
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मैं तन्हा था मैं तन्हा हूँ
तुम आओ तो क्या न आओ तो क्या
उबैदुल्लाह अलीम
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